राग दरबारी:
पुराने जमाने में राजा, महाराजाओं, जागीरदार आदि को दरबार कहते थे। दरबार की एक विशेष आदत थी कि जो कह दिया सो कर दिया, फिर बदलना नहीं। प्राण जाए पर वचन न जाई। इसमें उचित अनुचित के लिए कोई गुंजाईश नहीं थी। मुंह से निकला शब्द प्रतिष्ठा बन जाती थी।
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