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अफसरों ने ठाना है भाजपा को भगाना है!

जब-जब सिंहस्थ आता है तब-तब मप्र में तख्ता पलट होता है, सरकार बदलती है, मुख्यमंत्री बदलते हैं। सत्ताधारी विपक्ष में पहुंच जाता है और विपक्ष सत्ता में आ जाता है। इसे संयोग कहा जाए या कोई रीत! कहीं प्रदेशभर के अफसरों को ऐसा तो नहीं लग रहा कि मप्र से भाजपा की सरकार जाने वाली है तो क्यों न हम पूरी ताकत लगाकर इसे भगा दें? प्रदेश में प्रशासनिक अराजकता का माहौल बनता जा रहा है। सत्ताधारी दल के विधायक क्या, सांसद क्या, महापौर सब अफसरों की मनमानी से नाराज है। हद तो तब हो गई जब महामहिम राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल को अफसरों की कारगुजारियों से पर्दा उठाना को मजबूर होना पड़ा।

रतलाम । Kishan sahu

लोकतंत्र में जन भावनाओं की सरकार होती है और सरकार का कर्त्तव्य है वह जनभावनाओं के अनुरूप काम करें। यह वाक्य मप्र के लोकप्रिय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रजत शर्मा के शो आप की अदालत में एक सवाल के जवाब में कहा था। लेकिन मप्र के अफसरों ने जनभावना तो दूर की बात जो उनके नियमित कार्य है जैसे कानून व्यवस्था और नियमित प्रशासनिक कार्यो में ऐसा लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं कि आम जनता तो क्या खुद भाजपा के विधायक, महापौर, पूर्व मंत्री सहित अन्य जनप्रतिनिधि भी हैरान परेशान है।
कहीं विधायक कलेक्टर के खिलाफ धरना दे रहा है तो कहीं जिला पंचायत अध्यक्ष तो अब बारी थी मप्र के पूर्व गृह मंत्री हिम्मत कोठारी की। बीते दिनों एक मीसाबंदी के प्लाट पर कब्जे के मामले को लेकर कोठारी ने रतलाम एसपी से मुलाकात की और सारी वस्तु स्थिति से अवगत कराया जिसके बाद भी कार्रवाई न होने पर कोठारी को एसपी कार्यालय के बाहर धरना देना पड़ा। आमरण अनशन और पार्टी छोडऩे तक की धमकी देनी पड़ी। यह पूरा घटनाक्रम यह बताने के लिए काफी है कि मप्र में डेमोक्रेसी पर ब्यूरोक्रेसी किस तरह हावी होती जा रही है।
बीते सिंहस्थ के बाद सरकार बदली थी चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा के शिवराज सिंह चौहान को मुख्मयमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा और कांग्रेस की सरकार बनी जिसमें कमलनाथ मुख्यमंत्री बने थे। अब मप्र की जनता को कमलनाथ के शासन की याद आने लगी है कि किस तरह एक छोटा सा कांग्रेस का कार्यकर्ता भी एसपी कलेक्टर से अपने काम बड़ी सहजता से करवा लेता था।
तत्कालीन कमलनाथ सरकार के गृहमंत्री बाला बच्च्न कार्यकर्ता का फोन पहुंचने पर तत्काल एसपी तो क्या सीधे थानेदार को भी खुद फोन लगाकर मामले की जानकारी लेकर निष्पक्ष कार्रवाई के लिए ताकिद करते थे। आज गृहमंत्रालय मुख्यमंत्री जी के पास ही है और स्थिति हमारे सामने है।

तो अधिकारी सुनते किसकी है?


इंदौर के भागीरथपुरा में गंदा पानी पीने से 50 से ज्यादा लोगों की मौत के मामले में वहां के महापौर पुष्य भार्गव ने कहा था कि मैं क्या करूं, अधिकारी तो मेर सुनते ही नहीं है।
रतलाम विकास प्राधिकरण के नवनियुक्त संचालक मंडल के शपथ ग्रहण समारोह में रतलाम ग्रामीण के विधायक मथुरालाल डामर ने केबिनेट मंत्री चेतन्य काश्यप को संबोधित करते हुए कहा था कि मेरे क्षेत्र में सड़क बनवा दीजिए, लोक निर्माण विभाग के मंत्री जी के पीए हमारे आवेदन कचरे में फेंक देते है। यह एक भाजपा के आदिवासी विधायक का दर्द है कि अधिकारी उसकी नहीं सुन रहे तो सोचिए कि मप्र में आम आदमी की क्या स्थिति है। इसके पूर्व राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त जिला पंचायत अध्यक्ष का कलेक्ट्रेट परिसर में धरने पर बैठना , उसके पश्चात आलोट के विधायक चिंतामन मालवीय का किसानो की समस्याओं को लेकर कलेक्टोरेट में धरने पर बैठना और पूर्व गृह मंत्री का धरने पर बैठना इस बात की ओर इंगित करता है कि जनप्रतिनिधि अपनी ही सरकार में असहाय नजऱ आ रहे है।
सवाल यह उठता है कि भारतीय जानता पार्टी के शासनकाल में पार्टी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले और पार्टी की नीव को मजबूत करने वाले मीसा बंदियों और वरिष्ठ नेताओं को समस्याओं के लिए पार्टी की सत्ता होने के बावजूद सड़कों पर उतरना पड़ रहा है , धरने देना पड़ रहा है तो आम आदमी की क्या स्थिति है यह समझा जा सकता है । कुल मिलाकर सत्ताधारी दल के संगठन और सत्ता में बैठे नुमाइंदों का अपने ही शासन में प्रशासनिक तंत्र पर कोई लगाम नहीं है जिससे पार्टी के पुराने और नए कार्य कर्ताओं में निराशा और नाराजी का आलम बढ़ता जा रहा है ।

तेलंगाना और कर्नाटक में अफसरों पर कार्रवाई होती है तो मप्र में क्यों नहीं ?


16 अप्रैल 2026 को जनजाति समुदाय के विकास कायों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर प्रशासनिक अकादमी में रखी गई वर्कशाप में महामहिम राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने जनजातिय वर्ग के प्रति अफसरों के रवैये पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकार और अफसरों में अपनेपन का अभाव दिखता है। क्या ट्राइबल के बच्चे सरकार के कार्यक्रमों में सिर्फ डांस करने के लिए है। उन्होने आगे कहा कि राज्य में 21 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। यानी हर विभाग को अपने बजट में से इतना पैसा जनजातीय उपयोजना पर खर्च करना था लेकिन 22 प्रतिशत राशि जो 299 करोड़ से अधिक है। 2025-26 में लेप्स कर दी गई। यह पैसा तो भारत सरकार से मिलता है। इसका सही उपयोग क्यों नहीं किया गया। ट्राइबल डिपार्टमेंट से पूछा ही नहीं जाता कि पैसा कहां खर्च करना है। यह ठीक नहीं है। महामहिमजी ने माननीय मुख्यमंत्री के सामने यह सारी बात कहते हुए सरकार को चेता दिया लेकिन सरकार है कि अफसरों को कसने को तैयार ही नहीं है। तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में जनजातीय उपयोजना (टीएसपी) का पैसा खर्च न होने पर जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई होती है तो मप्र में क्यों नहीं हो रही है

अब हिम्मत कोठारी का धरना क्या चेतन्य काश्यप की विफलता है?


रतलाम के लाड़ले विधायक चेतन्य काश्यप जिन्हें जनता सम्मान से भैया जी पुकारती है जिन्हेें लगातार हर चुनाव में जनता से पहले से ज्यादा बढ़कर मान सम्मान मिल रहा है। बीते चुनाव में वे 60 हजार से अधिक मतों की लीड से चुनाव जीते और सरकार में मंत्री बनें। आज भैया जी मप्र सरकार का सबसे भरोसेमंद, विश्वसनीय और ईमानदार चेहरा है। केबिनेट में दो उप मुख्यमंत्री और उनसे सीनियर कई मंत्री होने के बावजूद भी सरकार और संगठन की ओर से उन्हें केबिनेट की बैठक में होने वाले अहम फैसलों की जानकारी देने के लिए आगे किया जाता है। जिससे रतलाम की जनता का उन पर और विश्वास बढ़ जाता है। जिलेभर के सारे जनप्रतिनिधि उनकी ओर बढ़ी आस से देखते है कि हमारा कोई भी काम अटकेगा तो भैया जी उसे रुकने नहीं देंगे हमारा सहयोग करेंगे। रतलाम जिले में प्रशासकीय अराजकता का माहौल है यह बात हिम्मत सेठ ने धरने के बाद प्रेस से चर्चा के दौरान कहीं और लगातार जनप्रतिनिधि शब्द को दोहराया। मीसा बंदी के प्लाट पर अवैध कब्जे को लेकर एसपी से हुई पहली मुलाकात और उस पर मीडिया द्वारा प्रमुखता से समाचार प्रकाशित करने को लेकर कोठारी ने कहा कि हमारे जनप्रतिनिधि क्या अखबार नहीं पढ़ते। उनके क्षेत्र में प्लाट पर अवैध कब्जे हो रहे हैं, कानून व्यवस्था सवालों के घेरे में है। इस तरह प्लाटों पर अवैध कब्जे होने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी तो ऐसी प्रवृत्ति बढ़ेगी…।
किसी के प्लाट पर दबंगाई से अगर कब्जा किया जाता है तो यह प्रशासन का स्वत स्फूर्त काम है कि वह शिकायत मिलने पर जांच करें और तत्काल कब्जा हटाएं लेकिन यहां तो सत्ताधारी दल के पूर्व गृह मंत्री के कहने के बाद भी अवैध कब्जा नहीं हटाया गया जिसे हटवाने के लिए उन्हें धरना देना पड़ा। इनके पूर्व भी दो जनप्रतिनिधियों को कलेक्टर के खिलाफ धरना देना पड़ा। इससे चेतन्य काश्यप जी का तो मान सम्मान नहीं बढ़ रहा है और उल्टा जनता में यह संदेश जा रहा है कि हमने भाजपा को वार्ड से लेकर नगर, प्रदेश और केन्द्र में भाजपा की सरकार बनवा दी। इसके बाद भी हमारी सुनवाई नहंी होती तो हम पार्टी के कार्यकर्ताओं, नेताओं के पास जाते है। अब तो उन्हें भी धरना देना पड़ता है।
रतलाम विधायक चेतन्य काश्यप की ‘अहस्तक्षेप या न्यूनतम हस्तक्षेप’ की नीति वहां तक तो स्वीकार्य है जहां तक लोक सेवकों की प्रशासकीय स्वतंत्रता की सीमा लागू होती है। लोकसेवकों की स्वच्छंदता और मनमानी पर अंकुश लगाने की भी जिम्मेदारी चेतन्य काश्यप की है, जिससे वे पीछे नहीं हट सकते। जनता ने 60 हजार से ज्यादा मतोंसे जीताकर उन्हें विधानसभा में भेजा है न कि कलेक्टर एसपी को चुना है। जनता अपनेसाथ होने वाली हठधर्मिता को भैया जी की विफलता मानती है। रतलाम नगर निगम ने तो तैयारी कर ली है कि वह बीजेपी के 30 हजार वोट काटकर ही दम लेगी। नगर निगम की जनविरोधी कारगुजारियों के बारे में जितना लिखा जाए कम है…। हिम्मत कोठारी का धरने पर बैठना , रतलाम की प्रशासनिक अराजकता को उजागर करता है और जनता इसे भैया जी की विफलता मानने को मजबूर है।

पारस भरगट का वीडियो चर्चा में


इस घटनाक्रम पर वरिष्ठ भाजपा नेता पारस भरगट ने वीडियो डालकर चिंता जाहिर की है कि आगामी चुनाव में यह सरकार के लिए खतरे की घंटी है। पारस भरगट कहते है कि मप्र में बिगड़ती प्रशासनिक व्यवस्था और कार्यकर्ताओं की सुनवाई न होने से पार्टी में निराशा का माहौल है।

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