करंट अफेयर्सकरियरराजनीतिराष्ट्रीय

उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की IAS कोचिंग योजना पर विवाद गहराया, सभी वर्गों के लिए प्रवेश की मांग तेज

लखनऊ। उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की ओर से संचालित IAS/PCS निःशुल्क कोचिंग योजना को लेकर नया विवाद सामने आया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर योजना की प्रवेश नीति पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि योजना सरकारी धन से संचालित हो रही है, तो इसका लाभ केवल एक विशेष समुदाय तक सीमित नहीं होना चाहिए।

प्रियंक कानूनगो ने अपने पोस्ट में कहा कि उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी का मूल उद्देश्य उर्दू भाषा का संरक्षण, प्रचार-प्रसार और साहित्यकारों के कल्याण से जुड़ा है। उन्होंने सवाल किया कि अकादमी द्वारा केवल अल्पसंख्यक समुदाय के लिए IAS कोचिंग संचालित करना उसके मूल उद्देश्यों के अनुरूप कैसे माना जा सकता है।उन्होंने यह भी दावा किया कि अकादमी के गठन संबंधी दस्तावेजों में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि संस्थान केवल किसी एक समुदाय के लिए कार्य करेगा। कानूनगो के अनुसार, जब कोचिंग हिंदी और अंग्रेज़ी माध्यम में भी उपलब्ध है और सरकारी संसाधनों से संचालित हो रही है, तब सभी धर्मों और वर्गों के योग्य छात्रों को प्रवेश का समान अवसर मिलना चाहिए।

प्रियंक कानूनगो की सोशल मीडिया पोस्ट का लिंक 👇👇👇

https://www.facebook.com/share/1E6qQXxHPC/

अपने बयान में उन्होंने राज्य सरकार से योजना की समीक्षा करने और आवश्यकता पड़ने पर प्रवेश नीति में सुधार करने का आग्रह किया है।

यह मुद्दा सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। एक पक्ष इसे समान अवसर और संवैधानिक सिद्धांतों से जोड़कर देख रहा है।

भाषाई संस्थान या तुष्टिकरण का अड्डा?

सवाल उठ रहा है कि उर्दू अकादमी का मुख्य कार्य उर्दू भाषा का संरक्षण और विकास करना है, या फिर यह मजहबी तुष्टिकरण का साधन बन गई है?

हिंदी/अंग्रेजी में कोचिंग, फिर हिंदुओं को नो-एंट्री क्यों?

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि कोचिंग का माध्यम हिंदी और अंग्रेजी रखा गया है, फिर भी इसमें हिंदू छात्रों को प्रवेश से वंचित क्यों रखा जा रहा है?

वंचित वर्गों की अनदेखी

आलोचकों का तर्क है कि इस नीति के कारण वंचित और गरीब वर्ग के हिंदू छात्रों के साथ घोर अन्याय हो रहा है। अगर योजना सरकारी धन से चल रही है, तो सभी धर्मों के छात्रों को समान अवसर मिलना चाहिए।

अखिलेश यादव और आजम खान पर लगे आरोप

इस विवाद की आंच पिछली सरकारों तक भी पहुँच रही है। यह योजना अखिलेश यादव ने शुरू की थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह की पक्षपातपूर्ण नीतियों की नींव रखने के लिए सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा के कद्दावर नेता आजम खान को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। उन पर आरोप है कि उन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति के तहत ऐसी नीतियां बनाईं जो बहुसंख्यक समाज के खिलाफ भेदभाव करती हैं।

फिलहाल, इस मामले पर उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी अथवा उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *