शास्त्रीय भाषा दर्जा मिलने के बाद शिक्षा मंत्रालय की पहल: इंदौर में ‘ऑनलाइन प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स’ का शुभारंभ
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इंदौर
भारत सरकार द्वारा प्राकृत भाषा को ‘शास्त्रीय भाषा’ (Classical Language) का दर्जा प्रदान किए जाने के परिप्रेक्ष्य में, शिक्षा मंत्रालय के भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) विभाग द्वारा तैयार किए गए ऑनलाइन प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स का औपचारिक शुभारंभ हुआ। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इंदौर स्थित नेमी नगर जैन कॉलोनी में आयोजित कार्यक्रम में आईकेएस (नई दिल्ली) के नेशनल कोऑर्डिनेटर प्रोफेसर जी. एस. मूर्ति ने प्राकृत प्रज्ञ जैनाचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के सानिध्य में इस पाठ्यक्रम का उद्घाटन किया।
जैन संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने की कुंजी
कार्यक्रम की संकल्पना और आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर में आईकेएस के मुख्य अन्वेषक प्रोफेसर डॉ. अनुपम जैन ने कहा कि प्राकृत भाषा का अध्ययन किए बिना जैन संस्कृति और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई को समझना असंभव है।
कोर्स की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए संयोजक डॉ. पारस जैन ने बताया:
- अवधि व स्वरूप: यह 6 महीने का सर्टिफिकेट कोर्स है, जिसकी कक्षाएं सप्ताह में 3 दिन आयोजित होंगी।
- विशेषज्ञ फैकल्टी: अध्यापन हेतु देशभर के प्राकृत भाषा के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को जोड़ा गया है।
- वैश्विक मानक: पाठ्यक्रम को आधुनिक तकनीक और उच्च स्तरीय विशेषज्ञता के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित किया जाएगा।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक उत्साह, पाठ्यक्रम पूर्णतः निःशुल्क
आईकेएस के नेशनल कोऑर्डिनेटर प्रोफेसर जी. एस. मूर्ति ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन के लिए पूज्य गुरुओं का मार्गदर्शन अनिवार्य है। इसी उद्देश्य से संस्थान ने आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया है। उन्होंने बताया कि इस पूर्णतः निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम में अब तक कश्मीर से कन्याकुमारी तक 200 से अधिक शिक्षकों और शोधार्थियों ने अपना पंजीकरण करा लिया है।
“प्राकृत हिंदी की दादी है”: आचार्य सुनील सागर जी महाराज
अपने आशीर्वचन की शुरुआत प्राकृत भाषा के मंगलाचरण से करते हुए जैनाचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने कहा:
“प्राकृत ने भारत की अनेक भाषाओं को समृद्ध किया है। कालक्रम की दृष्टि से देखें तो प्राकृत हिंदी की ‘दादी’ है, क्योंकि प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से आधुनिक हिंदी का विकास हुआ है। आम बोलचाल में हम रोज़ाना सैकड़ों प्राकृत शब्दों का उपयोग करते हैं, भले ही हम उससे अनजान हों।”
‘प्राकृत साहित्य में गणित’ पुस्तक रचना की घोषणा
समारोह के दौरान प्रोफेसर मूर्ति ने आईकेएस विभाग द्वारा प्रकाशित एवं डॉ. अनुपम जैन द्वारा रचित ‘जैन गणित संदर्भ ग्रंथ’ की प्रति पूज्य आचार्य श्री को भेंट की। आचार्य श्री की प्रेरणा से डॉ. अनुपम जैन ने ‘प्राकृत साहित्य में गणित’ शीर्षक से एक नई शोध-कृति रचने का दायित्व स्वीकार किया, जिसके प्रकाशन के लिए आईकेएस विभाग ने अग्रिम सैद्धांतिक सहमति प्रदान कर दी है।
ऑनलाइन प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स की मुख्य विशेषताएं
यह पाठ्यक्रम नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप भारतीय भाषाई विरासत को सहेजने के लिए तैयार किया गया है:
- कोर्स की अवधि: 6 महीने (पूरी तरह ऑनलाइन मोड और परीक्षा)।
- उद्देश्य: प्राकृत भाषा के बुनियादी नियमों, उसके समृद्ध साहित्य, व्याकरण और भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) में इसके योगदान का गहन अध्ययन कराना।
- योग्यता: शोधार्थी, शिक्षक, संकाय सदस्य, छात्र या प्राकृत भाषा व जैन/बौद्ध इतिहास में रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति।
- विशेष प्रोत्साहन: अंतिम परीक्षा के शीर्ष 10 प्रदर्शनकर्ताओं को ₹10,000 प्रति माह के वजीफे (Stipend) के साथ शिक्षा मंत्रालय के IKS विभाग में 3 महीने की इंटर्नशिप मिलेगी। शीर्ष 10% छात्रों को शैक्षणिक योग्यता पुरस्कार के रूप में पुस्तकें दी जाएंगी।
