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‘रतलाम की जनता का सपना जैन हो विधायक अपना…’ तो टटपूंजियों से काहे को डरना

रतलाम विकास प्राधिकरण का ‘शुद्ध सनातनी’ संचालक मंडल बना चर्चा का विषय
रतलाम । Kishan sahu

जनचर्चा यह है कि पार्टी के ऐसे टटपूंजीये जो दो-दो बार पार्षद का चुनाव अपने गृह वार्ड से हार गए उन्होंने पार्टी को ऐसा फीडबैक दिया कि पार्टी ने जुबिन जैन और विप्लव जैन को जैसे आगे बढ़ाया है उससे जैन सनातन का राजनीतिक अलगाव पैदा होने की आशंका है। जिससे पार्टी को नुकसान हो सकता है।

रतलाम का समाज एक ‘राजनीतिक समाज’ है। राजनीतिक समाज से आशय एक ऐसे समाज से होता है जो किसी दल या विचारधारा या किसी विशेष वैचारिक आचरण करने वाले व्यक्ति की उन्नति – प्रगति को और असफलता या हानि को अपनी हार और जीत मानता है। रतलाम का रूझान ऐसा रहा है कि उसने भाजपा की विचारधारा और अहिसंक जैन व्यक्ति को तरजीह दी है। ऐसे में टटपूंजीयों का यह कहना कि जैन व्यक्ति आरडीए में आता तो भाजपा को नुकसान हो सकता है यह सरासर गलत बात है। भाजपा को नुकसान तो रतलाम नगर निगम की कार्यशैली से हो रहा है। भाजपा के नेतृत्व वाली महापौर और महापौर परिषद की विकास के नाम पर जो विनाशलीला की जा रही है उससे सबसे ज्यादा नुकसान रतलाम विधायक चेतन्य काश्यप को हो रहा है। जनआक्रोश एक प्रमुख कारण अफसरशाही की मनमानी और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार है। टटपूंजीयों में दम है तो नगर निगम को जनहित की संस्था बनाए और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर लगाम लगाकर दिखाए। अपनी दलाल प्रवृत्ति को त्यागकर रतलाम के हित में काम करें। तब कहीं जाकर पार्टी को फिडबैक दे।

जैन व्यक्ति का रतलाम विकास प्राधिकरण में न आना और कई आशंकाओं और संभावनाओं को जन्म देता है कि लगातार पांच दशकों से जैन विधायक का सुख भोगने वाली रतलाम की जनता को कहीं इस सुख से वंचित करने की तैयारी तो नहीं चल रही है। यह कहीं जनता के धैर्य को मापने की कोई कोशिश तो नहीं। संभावना तो यह भी व्यक्त की जा रही है कि एक बार फिर जैन विधायक उतारा जाए तो यह टटपूंजीये यह हो हल्ला तो न कर दे कि पार्टी ने इतनी बार जैन को टिकिट दिया है एक बार ‘सनातनी’ को टिकिट देकर भी देखा जाए। तब जैन उम्मीदवार की चाह रखने वाली रतलाम की जनता की ओर से पार्टी को यह संदेश दिया जा सकता है कि महापौर ‘सनातनी’ है, आरडीए का पूरा संचालक मंडलन ‘सनातनी ‘ है। ऐसे में भाजपा से जैन उम्मीदवार का टिकिट तो बनता है।

जाति की संख्या और समीकरण दिखाकर टटपूंजीयों ने पा लिए बड़े-बड़े पद !

शहर में जाति की संख्या और जाति का समीकरण दिखाकर पार्टी में ऐसे-ऐसे टटपूंजीये बड़े-बड़े पद पर पहुंच गए जहां योग्य लोगों को होना था। अब टटपूंजीये बताते है कि हमारी जाति के तीस से चालीस हजार मतदाता है। हमें पार्टी बड़ा पद दे, हम पार्टी को वोट दिलाएंगे लेकिन हकीकत इसके उलट है। यह बड़े पदों पर आसीन टटपूंजीये इनके वार्ड से चुनाव हार गए इन्हें जात बिरादरी में कोई पूछता नहीं है फिर भी जाति की तुष्टिकरण का कार्ड लेकर पार्टी में बड़े पदों पर पहुंच जाते है। क्या रतलाम में भाजपा और कांग्रेस ने यह जानने की कोशिश की कि जिस जात बिरादरी को वे इतनी तवज्जो देते है वो क्या चाहती है। वो किसे अपना नेता मानती है। वो किसे दल में आगे बढाना चाहती है और किससे दूरी बनाना चाहती है।

शिवकुमार झालानी ‘सनातनी लहर ‘ पर नहीं कांग्रेस की सरकार बनने पर विधायक बने

टटपूंजीये जिनकी जात-बिरादरी मेंं पूछ-परख नहीं, जिन्हें जिनके वार्ड के लोग वोट न दे… वे बताते फिरते है कि एक बार रतलाम में ‘सनातनी लहर ‘ पर सवार होकर शिवकुमार झालानी हिम्मत कोठारी को हराकर रतलाम के विधायक बने थे। ऐसा नहीं है जिस चुनाव की बात ये टटपूंजीये करते है रतलाम का वो चुनाव निरस्त हो गया था और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई थी जिसके बाद चुनाव हुआ और मात्र लगभग पांच हजार से अधिक कुछ मतों से शिवकुमार झालानी कांग्रेस के टिकिट पर चुनाव जीते।

जनता टटपूंजियों को सबक सिखाने के लिए तैयार…। ‘

रिकार्ड भी यही बताते है कि हिम्मत कोठारी 6 चुनाव लड़़े जिसमें से वे ४ चुनाव जीते और सिर्फ एक बार अजैन शिवकुमार झालानी से कांग्रेस की सरकार बनने पर चुनाव हारे और दूसरी बार जैन व्यक्ति पारस सकलेचा से चुनाव हारे। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने तो कोठारी की दूसरी हार से सबक लिया और उनका टिकिट काटने के बाद दूसरे जैन व्यक्ति चेतन्य काश्यप को चुनाव लड़़ाया। जिसके बाद से चेतन्य काश्यप अजेय योद्धा के रुप में तीन चुनाव जीत चुके है। इस बार भी रतलाम की जनता को उम्मीद है कि भाजपा फिर से चेतन्य काश्यप को टिकिट देगी और जनता को जैन विधायक का सुख भोगने को मिलेगा। चेतन्य काश्यप की जीत के तीन चुनावों के ग्राफ को देखे तो हर चुनाव मे वह पिछले चुनाव से ज्यादा मतों के अंतर से जीतते है इस बार वे 60 हजार मतों की लीड से चुनाव जीते। लेकिन रतलाम विकास प्राधिकरण में किसी जैन व्यक्ति के न आने से जनता हताश है और जैन-सनातनी करने वाले टटपूंजीयों से नाराज है और जनता इन टटपूंजीयों को सबक सिखाने के लिए तैयार है।

आरडीए में जैन समाज को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के बाद अब राजनीतिक चर्चा इस बात पर केन्द्रित है किआगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा अपनी पारंपरिक रणनीति जारी रखेगी या टटपूंजियों के प्रभाव में नए सामाजिक समीकरणों पर काम करेगी? फिलहाल शहर में यह राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।

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