निर्मलता, निराकुशता, निश्काम सेवा, निष्कपट भाव से आगे बढता है संघ- आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा
आचार्यश्री ने कहा कि भगवान महावीर चतुर्विद संघ की स्थापना की थी। संघ साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविका का संयुक्त उपक्रम होता है, जिस संध में आशा और उल्लास का तेज होता है, वह तेजस्वी होता है। एक नैतृत्व संगठन, समुचित व्यवस्था और प्रयोग धर्मिता किसी भी संघ के माइल्ड स्टोन होते है।
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